लोकतंत्र का स्तंभ या राजनीतिक पार्टी प्रचारक ..

नई दिल्ली- ऐसे ही नही है सरदाना जी सुर्खियों में . दंगल से इनका पुराना रिश्ता है लेकिन कभी दंगा कभी दंगल ये महाशय की पुरानी अदा है ..चलिए चर्चा की जाए आज के शाम 5 बजे के प्रोग्राम की जिसका टाइटल है अमेरिका में जय और बिपक्ष में भय …

ऐसा नही लगता आपको की इनकी पत्रकारिता एक पक्षीय है या ऐसे मुख्य धारा की मीडिया चैनल जिसे भारतीय जनता लोकतंत्र का स्तंभ मानती है । और अगर उसी लोकतंत्र के पैर को जंग लग जाए तो क्या होगा पूरा लोकतंत्र ढह जाएगा लेकिन ऐसी पत्रकारिता इस भारत देश में ट्रेंडिंग में रहती है जो सत्ता से कम विपक्ष से ज्यादा सवाल करते हैं अपनी डिबेट्स में भी ऐसे पत्रकार सत्ता पक्ष से सवाल कम व विपक्ष से ज्यादा सवाल करते हैं

विज्ञापन वाली मीडिया

हमारे देश में मीडिया तेल शैंपू प्रोडक्ट आदि का विज्ञापन दिखाते हैं अब इन विज्ञापनों में राजनीतिक पार्टियों को भी जोड़ लिया गया है लेकिन लेकिन इन राजनीतिक पार्टियों को तेल शैंपू आदि प्रोडक्ट की तरह समझा जाए तो ठीक है लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है बल्कि अपने प्रोग्राम में उनका गुणगान गाया जाता है और गुणगान ऐसा बैसा नही मुझे बताने की जरूरत नही आप देख ही मुख्यधारा की मीडिया चैनल की भूमिका

आमेरिका में जय से विपक्ष में भय

सोचो अगर अमेरिका में जय हो रही है तो विपक्ष में भय क्यों होगा क्या इस तरीके के प्रोग्राम से जनता को क्या फायदा होगा क्या बेरोजगार को रोजगार मिलेगा । नौकरियां मिलेंगी या फिर केवल तमाशा है जिसका टाइम है 5 बजे शाम आये कॉफी पी तमाशा किया और चले गएमुख्यधारा की मीडिया चैनल पर नौकरी और रोजगार का विश्लेषणअगर माना जाए तो मुख्यधारा की मीडिया चैनल पिछले कई सालों से नौकरी और रोजगार संबंधी कोई सवाल ही नही किया बल्कि विपक्ष को अपने स्टूडियो में बुलाकर और उसी से ही सवाल किए और पूछा कि बताइए आपने आपकी सरकार ने क्या कियाफिर ये कि विपक्ष ने अपने प्रबक्ताओ को डिबेट्स में भेजना बंद कर दिया………

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